फार्मा में आईपीए का इस्तेमाल के लिए इंडियन फार्माकोपिया का सत्यापन करना चाहिए अनिवार्य

हरिद्वार। फार्मा सेक्टर में जिस आइसोप्रोपिल एल्कोहल (आईपीए) का इस्तेमाल किया जाता है उसके लिए केंद्र सरकार को इंडियन फार्माकोपिया (आईपी) का सर्टिफिकेशन अनिवार्य कर देना चाहिए क्योंकि आयातित आईपीए का इस्तेमाल करना जोखिम से भरा होता है। भारतीय आईपीए उत्पादकों का कहना है कि जिस सस्ते आईपीए का इस्तेमाल किया जा रहा है वह फार्माकोपिया के जरूरी पैमानों- जैसे यूवी एब्सार्बेंस टेस्ट, अनसेचुरेटेड हाइड्रोकार्बन की पहचान और तेजी से कार्बाेनाइज हो जाने वाली सामिग्रियों पर खरे नहीं उतरते। साथ ही, इनका यह भी मानना है कि इस तरह के कम गुणवत्ता वाले गैर-फार्मा ग्रेड आईपीए का बहुत ही बुरा असर दवाओं की गुणवत्ता पर पड़ता है जिससे लाखों भारतीयों का स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है। इसके चलते देश की फार्मा इंडस्ट्री का नाम भी खराब हो रहा है। हाल ही में जांबिया में जिस तरह से भारत की एक कंपनी द्वारा निर्मित दूषित कफ़ सिरप को लेकर चर्चा हुई उससे साफ़ पता चलता है कि किस तरह से मिलावटी सामिग्रियों का इस्तेमाल फार्मा उद्योग में किया जा रहा है। इन मिलावटी सामिग्रियों की वजह से न सिर्फ भारत में दवाइयों की गुणवत्ता पर बुरा असर पड़ रहा है और लाखों लोगों के जीवन को खतरा उत्पन्न हो गया है, बल्कि विदेशों में भी इसको लेकर बदनामी हो रही है। महाराष्ट्र के एफडीए के रिटायर्ड असिस्टेंट कमिश्नर विकास बियानी का मानना है, इस घटना के बाद भारत की छवि फार्मेसी जगत में काफी खराब हुई है। इस विशेष घटना के बाद डब्लूएचओ (विश्व स्वास्थ्य संगठन) ने भारतीय कंपनी के खिलाफ़ ग्लोबल अलर्ट जारी कर दिया है। इसको देखते हुए महाराष्ट्र और कर्नाटक के एफडीए अधिकारियों ने एक नियमावली जारी करते हुए कहा है कि सभी दवा निर्माता कंपनियां फार्माकोपिया द्वारा तय किए गए पैमानों के मुताबिक सीधे तौर पर उत्पादकों से सॉल्व्हेंट की खरीदारी करें। अब इस दिशा में कार्यवाई जरूरी हो गई है और अगर सावधानी बरती गई होती तो इस प्रकार की घटना पर रोक लगाई जा सकती थी। आइसोप्रोपिल एल्कोहल तमाम दवाओं के लिए एक महत्वपूर्ण सॉल्व्हेंट है, और इसमें मिलावटीपन और स्वास्थ्य संबंधी खतरे भी ज्यादा हैं इसलिए इस मामले पर गंभीरतापूर्वक ध्यान देने की जरूरत है। आईपीए को सामान्य तौर पर आइसोप्रोपेनाल कहते हैं, यह रंगहीन और ज्वलनशील द्रव है जिसकी महक काफी तेज होती है। इसका इस्तेमाल तमाम तरह के औद्योगिक और घरेलू रसायन को बनाने के लिए होता है, बल्क ड्रग्स और ड्रग के उत्पादन में भी इसका इस्तेमाल भारी मात्रा में होता है और फार्मा मैन्युफैक्चिरिंग प्रक्रिया में इसकी अहम भूमिका होती है। इसका इस्तेमाल हैंड सैनेटाइजर्स, एंटीसैप्टिक और किटाणुनाशक उत्पादों को तैयार करने के लिए भी भारी पैमाने पर होता है।

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