नगर निकाय चुनावों में इस बार असामान्य दृश्य देखने को मिल रहे हैं। बड़े राजनैतिक दलों के शीर्ष नेता अब तक लोकसभा और विधानसभा चुनावों तक सीमित रहते थे, अब छोटे शहरों और कस्बों की गलियों में धूल फाकते नजर आ रहे हैं। अपनी सत्ता को बरकरार रखने और प्रत्याशी की जीत सुनिश्चित करने के लिए बड़े नेता सड़को पर उतर कर रोड शो कर रहे हैं। यह नजारा एक नई परंपरा का संकेत देता है, लेकिन इसके गंभीर प्रभाव भी हैं। जो नगर निकाय चुनाव में कभी नही देखा गया।
बड़े नेताओं की सुरक्षा के लिए किए गए भारी तामझाम ने सड़कों पर आम जनजीवन को बाधित किया है। कई जगहों पर इनके सुरक्षा काफिले के कारण यातायात ठप हो जाता है, और कभी-कभी दुर्घटनाएं भी हो जाती हैं। इन हादसों का शिकार खुद राजनीतिक कार्यकर्ता ही बनते हैं। इसके अलावा, बड़े नेताओं की भागीदारी से स्थानीय मुद्दे और नेतृत्व हाशिए पर चले गए हैं। बिजली, पानी, सड़क, सफाई जैसे बुनियादी मुद्दे अब प्रचार की चकाचौंध में दब गए हैं।
इन चुनावों में धन और समय का भारी उपयोग भी चिंता का विषय है। रोड शो और भव्य प्रचार में जो संसाधन खर्च हो रहे हैं, उन्हें अगर स्थानीय विकास कार्यों में लगाया जाता, तो जनता को इसका सीधा लाभ मिल सकता था। इस तरह के आयोजनों से चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता पर भी सवाल उठते हैं। बड़े नेताओं की मौजूदगी मतदाताओं पर दबाव बना सकती है, जिससे स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
सामाजिक और सांस्कृतिक तनाव भी बढ़ने की आशंका है। बड़े नेताओं के प्रचार और रोड शो से राजनीतिक माहौल गरमा जाता है, जिससे छोटे शहरों और कस्बों में शांति और सद्भाव को खतरा हो सकता है। इसके अलावा, स्थानीय नेतृत्व के विकास की संभावनाएं भी कमजोर हो जाती हैं, क्योंकि बड़े नेताओं की उपस्थिति के कारण स्थानीय नेताओं को अपनी बात रखने का अवसर नहीं मिलता।
यह परंपरा सवाल खड़े करती है कि क्या यह लोकतंत्र को मजबूत कर रही है या स्थानीय राजनीति को कमजोर बना रही है। नगर निकाय चुनाव स्थानीय नेतृत्व और विकास के लिए होते हैं, लेकिन बड़े नेताओं की इस भागीदारी ने चुनावों की प्राथमिकताओं को ही बदल दिया है। जनता को चाहिए कि वह इन मुद्दों पर ध्यान दे और अपने वोट के माध्यम से सही नेतृत्व का चयन करे।