चुनावी पोस्टरों और प्रचार सामग्री में जो भेदभाव साफ तौर पर नजर आता है, वह हमारे समाज में पुरुष वर्चस्व की गहरी जड़ों को दर्शाता है। अगर कोई पुरुष उम्मीदवार चुनावी मैदान में उतरता है, तो उसके पोस्टरों पर उसकी पत्नी का नाम या तस्वीर शायद ही देखने को मिले। लेकिन जब कोई महिला उम्मीदवार मैदान में होती है, तो अक्सर उसके पोस्टर पर उसके पति का नाम और तस्वीर प्रमुखता से दिखाई देती है।
यह परंपरा यह संकेत देती है कि महिला शक्ति का ढोल भले ही पीटा जाता हो, परंतु वास्तव में निर्णय लेने और शक्ति का नियंत्रण अब भी पुरुषों के हाथों में ही है। यह धारणा समाज में गहराई तक बैठी हुई है कि महिला उम्मीदवार को पति की पहचान और समर्थन के बिना राजनीतिक या सामाजिक जीवन में मान्यता नहीं मिल सकती।
इस असमानता को और भी बल तब मिलता है जब महिला प्रत्याशी जीतती हैं, लेकिन उनकी जीत के बाद उनके पति को ‘मेयर पति’ या ‘पार्षद पति’ जैसे उपनामों से पुकारा जाने लगता है। यह न केवल महिला की राजनीतिक सफलता को परोक्ष रूप से कम आंकने का प्रयास है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि समाज अभी भी महिलाओं को समानता का अधिकार देने से हिचक रहा है।
एक बड़ा सवाल यह उठता है कि जब पुरुष उम्मीदवार अपने प्रचार में अपनी पत्नी का जिक्र नहीं करते, तो महिलाओं को अपने पोस्टरों पर पति का नाम और तस्वीर क्यों दिखानी पड़ती है? क्या यह समाज की उस मानसिकता का हिस्सा है जो मानती है कि पुरुष का अस्तित्व और सहमति हर क्षेत्र में अनिवार्य है?
इस सोच को बदलने के लिए जरूरी है कि समाज महिलाओं को एक स्वतंत्र और सक्षम इकाई के रूप में देखे। महिलाओं की पहचान उनके अपने कार्य और व्यक्तित्व के आधार पर होनी चाहिए, न कि उनके पति या परिवार के नाम पर। जब तक यह मानसिकता नहीं बदलेगी, तब तक महिला सशक्तिकरण की बात केवल शब्दों तक सीमित रहेगी।
समय आ गया है कि चुनावी प्रक्रिया में भी महिलाओं को समान सम्मान और स्वतंत्रता मिले। उनके पोस्टरों और प्रचार सामग्री में उनके अपने कार्यों, विचारों और दृष्टिकोण को जगह मिलनी चाहिए, न कि उनके पति की पहचान को। इससे न केवल महिलाओं के प्रति समाज की सोच बदलेगी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी सशक्तिकरण का सही अर्थ समझ में आएगा।