‘चिंतन शिविर 2025’ का भव्य शुभारंभ, सामाजिक न्याय की दिशा में बड़ा कदम

देहरादून,  उत्तराखंड की राजधानी देहरादून आज सामाजिक न्याय के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक पहल का साक्षी बना, जब भारत सरकार के सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय द्वारा दो दिवसीय ‘चिंतन शिविर 2025’ का शुभारंभ किया गया। इस शिविर का उद्देश्य समावेशी नीति निर्माण, कल्याणकारी योजनाओं की समीक्षा और उपेक्षित समुदायों के लिए न्यायसंगत व्यवस्था को मजबूत करना है। केंद्र और राज्य सरकारों के बीच सहयोग को सशक्त बनाने की दिशा में यह आयोजन एक मील का पत्थर साबित हो सकता है।

शिविर का उद्घाटन केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री डॉ. वीरेंद्र कुमार, राज्य मंत्री रामदास अठावले, बी.एल. वर्मा तथा उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की गरिमामयी उपस्थिति में हुआ। देशभर से सामाजिक न्याय विभागों के 23 मंत्रीगण भी इस अवसर पर सम्मिलित हुए, जिन्होंने अपने-अपने राज्यों में सामाजिक न्याय की दिशा में किए गए प्रयासों को साझा किया और आपसी सहयोग पर बल दिया।

उद्घाटन भाषण में डॉ. वीरेंद्र कुमार ने कहा कि सामाजिक समानता के बिना देश की प्रगति अधूरी है। उन्होंने कहा कि ‘चिंतन शिविर’ केवल योजनाओं की समीक्षा का मंच नहीं, बल्कि यह नए विचारों के आदान-प्रदान और समावेशी भारत की दिशा में हमारी प्रतिबद्धताओं को परखने का अवसर है। उन्होंने इसे आत्ममूल्यांकन का माध्यम बताते हुए कहा कि यह मंच हमें यह सोचने का मौका देता है कि हम कहां हैं और हमें कहां पहुंचना है। कल्याण से सशक्तिकरण तक की यात्रा हमारी साझा जिम्मेदारी है।

इस शिविर में भारत के लगभग सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों—जैसे आंध्र प्रदेश, असम, बिहार, छत्तीसगढ़, दिल्ली, गुजरात, कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र, राजस्थान, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, पुडुचेरी आदि—से आए प्रतिनिधियों ने उत्साहपूर्वक भागीदारी की। पहले दिन की चर्चाओं में शिक्षा, आर्थिक विकास, सामाजिक संरक्षण और सुगम्यता जैसे चार अहम विषयों पर गहन विचार-विमर्श हुआ। दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग (DEPwD) ने ADIP योजना, छात्रवृत्तियों, कौशल विकास और डिजिटल समावेशन से जुड़ी पहलों की प्रगति साझा की। विभिन्न राज्यों ने अपने अभिनव प्रयासों जैसे मोबाइल मूल्यांकन शिविर, समावेशी स्कूल ढांचे और सुगम परिवहन मॉडल की सफल प्रस्तुतियां दीं।

शिक्षा के क्षेत्र में भी गहन चर्चा देखने को मिली, जहां प्री-मैट्रिक और पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्तियां, पीएम-यशस्वी योजना और डिजिटल आवेदन से जुड़ी चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा हुई। विशेषकर ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में जागरूकता और सत्यापन प्रक्रियाओं को और प्रभावी बनाने पर जोर दिया गया।

चिंतन शिविर का यह आयोजन केवल नीतियों के मूल्यांकन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भविष्य के भारत की सामाजिक संरचना को और मजबूत करने की दिशा में एक सशक्त कदम है। सभी की निगाहें अब दूसरे दिन होने वाली नीतिगत चर्चाओं और निर्णयों पर टिकी हैं, जिनसे आने वाले समय में सामाजिक न्याय की दिशा में ठोस बदलाव देखने को मिल सकते हैं।

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