महिलाओं के प्रति क्यों नहीं सुधरता उत्तराखंड पुलिस का रवैया

सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट दिशा निर्देशों के बावजूद उत्तराखंड पुलिस का रवैया नहीं सुधर रहा है। मित्र पुलिस होने का दावा करने वाली उत्तराखंड पुलिस के ऐसे कारनामे आजकल चर्चा में है परंतु सरकार और जिम्मेदार अधिकारी इसके प्रति गंभीर नजर नहीं आते जो की चिंता का विषय है।
सारे नियम कानूनों को निजी बपौती समझने वाले बेलगाम पुलिसकर्मियों के यह कारनामे आए दिन प्रकाश में आते हैं हाल ही में उत्तराखंड के काशीपुर थाने में 3 दिन पहले ऐसी घटना सामने आई है जिसमें एक दरोगा दो सिपाही लेकर एक महिला के घर सम्मन तामील कराने गए , किसी बात को लेकर विवाद बढ़ गया और हाथापाई की नौबत आ गई। बाद में रात में ही महिला को थाने ले जाया गया इस महिला ने स्पष्ट आरोप लगाए हैं कि हिरासत में दरोगा ने उसके साथ मारपीट और गाली गलौज की , महिला के खिलाफ तो पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर लिया परंतु मारपीट के बाद हालत बिगड़ने पर सरकारी अस्पताल गई महिला की किसी अधिकारी ने सुध नहीं ली ।यहां बता दें कि पुलिस की इस कार्रवाई में महिला कांस्टेबल दरोगा के साथ नहीं थी।
ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति ना हो इसके लिए महिलाओं को भी यह जानना आवश्यक है कि पुलिस किन किन परिस्थितियों में महिला को गिरफ्तार कर सकती है। यहां उल्लेख करना जरूरी है कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट दिशानिर्देश हैं कि किसी भी मामले में महिला कांस्टेबल या परिवार के किसी सदस्य की मौजूदगी में ही घर पर पूछताछ की जा सकती है ,सीआरपीसी की धारा 46 { 4} के तहत किसी भी महिला को सूरज ढलने के बाद और सूर्य उदय से पहले गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। रात के समय महिला कांस्टेबल भी किसी को गिरफ्तार नहीं कर सकती। असाधारण परिस्थितियों में महिला पुलिस अधिकारी द्वारा न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी की पूर्व अनुमति के बाद ही किसी महिला की गिरफ्तारी की जा सकती है किसी भी महिला अपराधी को पुलिस को मारने का अधिकार नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देशों को ताक पर रखकर मनमानी कर रहे कुछ पुलिसकर्मियों को सबक सिखाने के लिए विभागीय अधिकारियों व शासन को सख्त कदम उठाए जाने की आवश्यकता है।

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