कथित पत्रकारों की ओछी हरकतों से लोकतन्त्र के चौथे स्तंभ की साख पर बट्टा

आजकल पत्रकारिता, जो कभी लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मानी जाती थी, अपनी साख खोती नजर आ रही है। कुछ प्रतिष्ठित पत्रकार मीडिया की आड़ में ठगी, ब्लैकमेलिंग और अन्य गोरखधंधों में लिप्त होकर पूरे पेशे को कलंकित कर रहे हैं। उनका तर्क होता है कि मीडिया में पर्याप्त सैलरी नहीं मिलती, इसलिए मजबूरी में ऐसा करते हैं, लेकिन यदि किसी पेशे में ईमानदारी नहीं निभा सकते तो उसे अपनाने का औचित्य ही क्या है? पत्रकारिता का मूल उद्देश्य समाज को सच्ची और तथ्यात्मक जानकारी देना है, न कि निजी स्वार्थों की पूर्ति करना। सोशल मीडिया के दौर में स्थिति और भी चिंताजनक हो गई है, जहां कुछ तथाकथित पत्रकार बिना पुष्टि के अधूरी खबरें प्रसारित कर रहे हैं, जिससे भ्रम और अफवाहें फैलती हैं। इससे न केवल समाज को नुकसान होता है, बल्कि वे पत्रकार भी बदनाम होते हैं जो ईमानदारी और निष्ठा से अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर रहे हैं।

सरकार सोशल मीडिया को बढ़ावा तो दे रही है, लेकिन पत्रकारिता की गिरती साख को रोकने के लिए कड़े नियम लागू करना आवश्यक है। आज कई पत्रकार नेताओं से मिले लिफाफों और ब्लैकमेलिंग पर निर्भर हैं या फिर प्रेस क्लब, मीडिया सेंटर और यूनियनों में पद प्राप्त करने की दौड़ में लगे हुए हैं। चिंता की बात यह है कि इन यूनियनों में ऐसे लोग भी शामिल हो जाते हैं जिनका पत्रकारिता से कोई लेना-देना नहीं होता और वे केवल अपने अवैध कार्यों को बढ़ावा देने के लिए सदस्य बनते हैं। यह स्थिति न केवल पत्रकारिता के लिए खतरनाक है, बल्कि समाज के लिए भी घातक है। प्रेस क्लब या अन्य संगठनों में केवल उन्हीं लोगों को सदस्यता दी जानी चाहिए जो सक्रिय पत्रकारिता कर रहे हों और समाज के हित में सटीक जानकारी देने का कार्य कर रहे हों।

सरकार को इस दिशा में ठोस कदम उठाते हुए पत्रकारिता में न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता अनिवार्य करनी चाहिए और उन पत्रकारों की एक मान्यता प्राप्त सूची जारी करनी चाहिए जो वास्तव में इस पेशे से जुड़े हैं। इसके अलावा, गलत सूचना फैलाने या पत्रकारिता के नाम पर ब्लैकमेलिंग करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए ताकि इस पेशे की गरिमा बनी रहे। जनता को भी जागरूक रहना होगा कि हर सोशल मीडिया अपडेट खबर नहीं होती और केवल विश्वसनीय स्रोतों पर ही भरोसा करें। यदि समय रहते इस दिशा में कदम नहीं उठाए गए तो पत्रकारिता का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है, जो किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं होगा।

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