स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं उसे लेकर ही रहूँगा, का नारा देने वाले महान स्वतंत्रता सेनानी

सिमरप्रीत सिंह

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक जिनका मूल नाम केशव गंगाधर तिलक था, का जन्म 23 जुलाई 1856 को हुआ। वह भारतीय राष्ट्रवादी, शिक्षक, समाज सुधारक, वकील और एक स्वतन्त्रता सेनानी थे।

लोकमान्य तिलक जी ब्रिटिश राज के दौरान स्वराज के सबसे पहले और मजबूत अधिवक्ताओं में से एक थे, तथा भारतीय अन्तःकरण में एक प्रबल आमूल परिवर्तनवादी थे। उनका मराठी भाषा में दिया गया नारा “स्वराज्य हा माझा जन्मसिद्ध हक्क आहे आणि तो मी मिळवणारच” (स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं उसे लेकर ही रहूँगा) बहुत प्रसिद्ध हुआ।

भारत की आजादी के लिये मिट्टी से लोहपुरुषों यानी सशक्त, शक्तिशाली एवं राष्ट्रभक्त इंसानों का निर्माण करने का श्रेय जिस महापुरुष को दिया जाता है, वह लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, जो स्वतंत्रता आंदोलन के समय देश की आशाओं के प्रतीक बने। उनके विचारों और कार्यों ने स्वतंत्रता संग्राम को एक नई दिशा देने में अग्रिम भूमिका निभाई।

उन्होंने ‘स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा’ का नारा देकर लाखों भारतीयों को प्रेरित, संगठित और आन्दोलित किया। तिलक व्यक्ति-प्रबंधन कैसे करते, किस तरह आजादी के लिये हर भारतीय के मन में आन्दोलन की भावना भरते, मनुष्यों को कैसे पहचानते थे और सशक्त-आजाद भारत के लिये बृहत्तर आन्दोलनों के लिये कैसे उनके योगदान को प्राप्त करते थे, वह अपने आपमों विस्मय और अनुकरण का विषय है।

भारतीय आजादी संघर्ष इतिहास के दौर में कुछ मुट्ठी भर ही ऐसे लोग थे, जिन्होंने आजादी के लिये नई लकीरें बनाई। उन्होंने अपना जीवन अपनी शर्तों पर जीते हुए आजादी दिलाने की विलक्षण यात्रा पूरी की। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का जीवन इसका अपवाद नहीं है। यह महान् क्रांतिकारी एवं स्वतंत्रता सेनानी अपने वजूद के रेशे-रेशे में, अपनी सांस-सांस में आजादी की सिहरन को जीता रहा।

शायद इसीलिये उनका हर कृत, हर विचार और हर चरण हमें आजादी के करीब ले गया। उनको याद करने के अनेक कारण है, अनेक दृष्टिकोण है, अनेक आयाम हैं।

तिलकजी का समूचा व्यक्तित्व धधकती ज्वालामुखी की तरह था। जिस तरह नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने ‘तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा’ का जयघोष किया और वह पूरे देश का कण्ठहार बन गया, उसी तरह तिलक जी ने स्वराज्य को अपना जन्मसिद्ध अधिकार बना कर उसे सब का अधिकार बना दिया, जन-जन की आवाज बना दिया।

वह लोकमान्य नाम से मशहूर थे। तिलक का जन्म 23 जुलाई, 1856 को महाराष्ट्र के रत्नागिरि में हुआ था। तिलक के पिता श्री गंगाधर रामचंद्र तिलक संस्कृत के विद्वान और प्रसिद्ध शिक्षक थे। तिलक एक प्रतिभाशाली छात्र थे। वह अपने कोर्स की किताबों से ही संतुष्ट नहीं होते थे। गणित उनका प्रिय विषय था। वह क्रेम्बिज मैथेमेटिक जनरल में प्रकाशित कठिन गणित को भी हल कर लेते थे। तिलक का मानना था कि अच्छी शिक्षा व्यवस्था ही अच्छे नागरिकों को जन्म दे सकती है।

तिलक भारतीय पत्रकारिता के आदर्श थे। उनकी पत्रकारिता भारत की आजादी एवं नये भारत के निर्माण की पत्रकारिता थी। वे राष्ट्रीयता, निष्पक्षता एवं निर्भयता की पत्रकारिता के जनक थे। सन् 1881 में विष्णु शास्त्री चिपलूणकर के साथ मिलकर ‘केसरी’ और ‘मराठा दर्पण’ नामक साप्ताहिक का प्रकाशन शुरू किया था। तब केसरी में तिलक ने साफ-साफ लिख दिया था कि ‘केसरी निर्भयता एवं निष्पक्षता के सभी प्रश्नों पर चर्चा करेगा।’

उन्होंने यह भी लिखा कि ‘ब्रिटिश शासन की चापलूसी करने की जो प्रवृत्ति आज दिखाई देती है, वह राष्ट्रहित में नहीं है।’ उस समय के जो छोटे-मोटे अखबार निकल रहे थे, उनमें ब्रिटिश सरकार की चाटुकारिता साफ दिखाई देती थी, उसे देखकर तिलकजी व्यथित हुए और यही कारण है कि केसरी के तेवर को समझने के लिए तिलकजी की एक पंक्ति अपने आप में पर्याप्त है, जिसमें वह कहते हैं ‘केसरी के लेख इस के नाम को सार्थक करेंगें।’

उनका आशय यही था कि जिस तरह से शेर गरजता है उसी तरह से केसरी की पत्रकारिता भी गरजेगी। यही हुआ भी। बहुत जल्दी तिलकजी ब्रिटिश शासकों की आंखों की किरकिरी बन गये। तिलक के विचारों से अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ समाज में वैचारिक वातावरण भी बनने लगा। आजादी के लिये संघर्ष करने वालों को एक बल मिला, दृष्टि मिली एवं दिशा मिली।

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