उत्तरकाशी। अपनी लोक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत के पुनरुद्धार के संकल्प के साथ बीते दस वर्षों से भगवान श्री काशी विश्वनाथ मंदिर, उत्तरकाशी में फूलदेई उत्सव को विशेष पहल के रूप में मनाया जा रहा है। इस पहल का उद्देश्य समाज में भूली-बिसरी लोक परंपराओं और सांस्कृतिक धरोहर को पुनः स्थापित करना है। भगवान श्री काशी विश्वनाथ की प्रेरणा से यह आयोजन महंत श्री अजय पुरी के नेतृत्व में निरंतर संरक्षित और संवर्धित किया जा रहा है।
फूलदेई संग्राद का यह पारंपरिक कार्यक्रम चैत्र माह की संक्रांति से प्रारंभ होकर आठ दिनों तक चलता है। इस दौरान श्री काशी विश्वनाथ गुरुकुलम के बाल सेवक प्रतिदिन मंदिर परिसर की समस्त देहरियों में पुष्प अर्पित कर इस लोकपर्व को जीवंत बनाए रखते हैं। इस पहल के माध्यम से हिमालयी पुष्पों को भी प्रोत्साहन दिया जाता है, जिनमें विशेष रूप से फ्योंली और बुरांश के फूलों को प्राथमिकता दी जाती है, ताकि नई पीढ़ी को अपने प्राकृतिक संसाधनों और पर्यावरण के प्रति जागरूक किया जा सके।
फूलदेई पर्व के इसी क्रम में गुरुकुलम के बाल सेवकों ने आज भी उत्साह और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ कार्यक्रम आयोजित किया। सर्वप्रथम बाल सेवकों ने पारंपरिक वेशभूषा और लोक वाद्य यंत्रों के साथ भगवान श्री काशी विश्वनाथ की विशेष पूजा-अर्चना की। इसके पश्चात वे जिलाधिकारी आवास पहुँचे, जहाँ उन्होंने परंपरा के अनुसार फ्योंली सहित अन्य स्थानीय पुष्प देहरियों में अर्पित कर फूलदेई पर्व की शुभकामनाएँ दीं।
इस अवसर पर जिलाधिकारी प्रशांत आर्य ने बच्चों को संबोधित करते हुए कहा कि शिक्षा ही सशक्त भविष्य की कुंजी है। हमारी संस्कृति और परंपराओं से जुड़ाव जीवन मूल्यों को सुदृढ़ करता है और हमें संस्कारवान बनाता है।
इसके उपरांत गुरुकुलम के बच्चे महंत श्री जयेंद्र पुरी के आवास भी पहुँचे, जहाँ उन्होंने परंपरा के अनुसार देहरियों में पुष्प अर्पित कर आशीर्वाद प्राप्त किया।
इस अवसर पर अनन्या बिष्ट, वैष्णवी रावत, आस्था रावत, दिव्यांशी कुड़ियाल, श्रेयांश डोभाल, अर्नव पुंडीर, कृष्णा रावत, अंकित, मनदीप रावत, पारस कोटनाला सहित अन्य बाल सेवक तथा सुरेंद्र गंगाड़ी और माधव भट्ट उपस्थित रहे।
इस प्रकार फूलदेई उत्सव न केवल एक लोकपर्व के रूप में बल्कि नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति, प्रकृति और परंपराओं से जोड़ने के एक महत्वपूर्ण माध्यम के रूप में निरंतर आगे बढ़ रहा है।