हरिद्वार। देश में किन्नर अखाड़ा, वाल्मीकि अखाड़ा सहित अन्य सामाजिक अखाड़ों के गठन को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने अपना रुख स्पष्ट कर दिया है। परिषद के संपर्क प्रमुख, राष्ट्रीय मीडिया संयोजक एवं श्री पंचायती अखाड़ा नया उदासीन के महामंडलेश्वर पूर्ण गुरु श्री करौली शंकर दास जी महाराज ने कहा कि अखाड़ा परिषद प्राचीन परंपराओं की रक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है और परिषद में 14वें अखाड़े के लिए कोई स्थान नहीं है।
उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी वर्ग या समाज को अपना संगठन, परिषद या अखाड़ा बनाने का पूरा अधिकार है। परिषद को इससे कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन सैकड़ों वर्षों पुरानी परंपरा के अनुसार अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद केवल 13 पारंपरिक अखाड़ों का प्रतिनिधित्व करती है। इसलिए परिषद के मूल स्वरूप में किसी नए अखाड़े को शामिल नहीं किया जा सकता।
करौली शंकर दास महाराज ने कहा कि महाकुंभ, अर्धकुंभ और उत्तराखंड में आयोजित कुंभ मेलों में अमृत स्नान तथा अखाड़ों के क्रम की व्यवस्था प्राचीन परंपराओं और आपसी सहमति पर आधारित है, जिसका उल्लेख शासन-प्रशासन के अभिलेखों में भी है। इसमें किसी प्रकार के बदलाव या भ्रम की कोई गुंजाइश नहीं है।
उन्होंने कहा कि यदि भविष्य में किसी विषय पर विचार की आवश्यकता हुई भी, तो वह केवल 13 अखाड़ों की सर्वसम्मति से ही संभव होगा। कुंभ मेलों की व्यवस्थाएं और प्रशासन के साथ समन्वय भी इन्हीं 13 अखाड़ों की परंपरागत व्यवस्था के आधार पर आगे चलता रहेगा।
महामंडलेश्वर ने सभी संतों से संयम और मर्यादा के साथ वक्तव्य देने की अपील करते हुए कहा कि सभी संत पूजनीय हैं, लेकिन सनातन परंपराओं की मर्यादा और अखाड़ा परिषद की ऐतिहासिक व्यवस्था को अक्षुण्ण बनाए रखना सर्वोच्च प्राथमिकता है।